Navyug Ki Naveen Srishti

नवयुग के नवीन सृष्टी करने वाले हमारे समाज के बुद्धिजीवियों के पास नवीन सृष्टी के साथ पनपने वाले रोगों के सही निदान के लिए एक पारदर्शी ज्ञान का होना आवश्यक है | अपने जीवन के उषा काल में ही समाज के भीतर विकृति और विरोध से मानव देह छत् विछत और अंतर्मन विदीर्ण हो चूका प्रतीत होता है | जीवन की विकृतियाँ सत्य और उनके प्रयोगों पर आश्चर्यजनक रूप से भारी पड़ती नजर आती हैं | मानव देह की पीड़ा दूर करने की विधियां हम जानते हैं पर मन की पीड़ा दूर करने वाली औषधियाँ निष्प्राण प्रतीत हो रही है | रोग असाध्य हो चूका है | महात्याग कर्तव्यनिष्ठा एवं निरंतर सेवा चकित कर देने वाले शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं हैं | शायद यह निस्तेज जीवन असंयम का परिणाम है | मनुष्य की बौद्धिक शक्तियाँ मानसिक चेतना परिष्कृत हों इसके लिए मानव जीवन के विकाश पर दृष्टि डालनी होगी |

हमारे ऋषि मुनि कहते हैं की नैतिकता की अवहेलना जीवन में सदैव रोग शोक पीड़ा पतन जैसे उपद्रव खड़े करती है | अनैतिक आचरण से प्राण ऊर्जा की बर्बादी होती है | चरित्र एवं व्यवहार का सारा ताना बाना गरबडा जाता है | आधुनिकता के नाम पर इन दिनों वर्जनाओं और मर्यादाओं पर ढेरों सवालिया निशान लगाये जा रहें हैं और ऐसा किये जाने के परिणाम किसी से छुपे नहीं हैं | अमर्यादित भोग स्वार्थलिप्सा तृष्णा की तुष्टि अनैतिकता के ही लक्षण हैं | हमारा जो असामान्य व्यवहार है वह सब अनैतिक आचरणों और अनैतिक अवलंबनो के कारण ही है |

मैं यह सारी बातें आज राष्ट्र के समक्ष खड़ी एक गंभीर समस्या के संदर्भ में कह रहा हूँ | हाल के कुछ वर्षो में प्रकाश में आई घटनाओं ने मुझे इन समस्याओं पर विचार एवं मंथन करने के लिए प्रेरित किया | समाज में हमारी माताओं और बहनों के प्रति जो अत्याचार प्रदर्शित होते रहे हैं या फिर हो रहे हैं उनके कारणों का विश्लेषण करना अनिवार्य हो जाता है |

हमें कई बिन्दुओ पर विचार करना होगा, कई सवाल हल करने होंगे | क्या वहशियों को कड़े कानूनों के तहत फांसी समस्याओं का अंत कर सकती है या असंयमित उन्माद की लहर देश के कोने कोने मे फैलाकर पुलिस और सरकार को निशाना बनाकर ही समस्या का अंत किया या सकता है | या फिर बदलाव की शुरुआत कही और से करनी होगी | कुछ बिन्दुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करता हूँ |

संसार के समस्त जीवों में चार तरह की प्रवृतियां सामान्य रूप से पायी जाती है | भाई, भूख, निद्रा, मैथुन | इनमे से किसी के साथ छेड़छाड़ हमारे व्यवहार को असामान्य कर सकती है जैसा की दिल्ली में घटी पहले की एक घटना में पांच साल की बच्ची से बलात्कार करने से पहले एक बाईस साल के लड़के ने अश्लील फिल्म अपने मोबाईल फ़ोन पर देखी थी उसके बाद उसकी करनी जग जाहिर है | उसे सजा मिलनी चाहिए | कम से कम फांसी हो होनी ही चाहिये | १६ दिसम्बर के वहशियों को तो सजा सुनाई भी जा चुकी है पर के उन्हें फांसी देकर समाज के कड़ोड़ो लोगो के मन में जो विकृति फ़ैल रही है ( फिल्मों, विज्ञापनों, इन्टरनेट पर फैले अश्लील चलचित्रों एवं साहित्यों के माध्यम से ) उसे ख़त्म किया जा सकता है ? मुझे लगता है नहीं ऐसा नहीं किया जा सकता है | जिस कारण से हमारे अंदर वो विकृति बढ़ रही है उस कारण को पहले ख़त्म करना होगा | आज हम आन्दोलन करते हैं, भूख हरताल करते हैं सिर्फ दुराचारियों को फांसी देने के लिए पर मूल समस्याओं पर अभी भी हमारा ध्यान नहीं गया है | क्यों न हम अपना आन्दोलन कड़े कानून बनवाने के साथ साथ उन चीजों पर अंकुश लगवानें के लिए भी करें जो समाज में विष फैला रहे हैं | कठोर कानून बनवाकर जिसमें अत्याचार के बाद सजा का प्रावधान होगा कुछ नैतिक वर्जनाओं के माध्यम से इस स्थिति तक पहुँचने से पहले हम समाधान की तरफ बढ़ सकतें हैं | हम आधुनिक होंगे पर अपनी प्रवृतियों को परिष्कृत करने के लिए न की उन्हें विकृत करने के लिए | हमें और हमारी सरकारों को अपनी अंतर्चेतना में इन बिन्दुओ पर महासंकल्प का विकास करना होगा

  • देश में इन्टरनेट पर उपलब्ध सभी अश्लील विज्ञापनों, साहित्यों, चलचित्रों , वेबसाइटो को प्रतिबंधित करना होगा |
  • चैनलों पर दिखाए जा रहे विज्ञापनों में आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता न परोसी जाए |
  • चलचित्रों को मर्यादित ढंग से बनाया जाय |
  • शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए |
  • महिलाओं को अपने हक़ के लिए जागरूक करना होगा |
  • प्राचीनकाल में भारतीय संस्कृति को देव संस्कृति कहा जाता रहा है | इसका एक बड़ा कारण वो सम्बन्ध है जो भारतीय समाज और आध्यात्म के बीच रहा है और यह प्रबंध मनुष्य को आदर्श्निष्ट बनाए रखने के लिए हर स्तर पर विवेकसंगत मालूम होता है अतः मानव जीवन और आध्यात्म के बीच के संबंधो को प्रगाढ़ करने का प्रयास करना होगा |

इन सभी मुद्दों पर बड़े स्तर पर पहल की आवश्यकता है हमारी सरकारों को इन विषयों पर खुल कर सामने आना होगा |