Samudrik Sashtra

सामुद्रिकशास्त्र
हस्त रेखाओं द्वारा किसी भी व्यक्ति के चरित्र स्वाभाव एवं जीवन में घटने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है | यह विद्या सहस्त्रों वर्ष पुरानी है और इसका उद्दगम स्थल भारत ही है हमारे यहाँ प्राचीनकाल में इसे सामुद्रिकशास्त्र तथा बाद में लक्षण शास्त्र के नाम से जाना जाने लगा | प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों ने पदार्थ, प्रकृति, ब्रह्मण्ड, जीव आदि के विभिन्न ऊर्जा चक्रों का अध्ययन करके कई प्रकार के शोध किये और परिणाम को संचित कर गये | उसके बाद ये विज्ञान विभिन्न धाराओं में बंट गया जिन्हें हम मंत्र विज्ञान, अनुष्ठान विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, सूक्ष्मशरीर विज्ञान इत्यादि के नाम से जानते हैं | लक्षण विज्ञान या सामुद्रिक विज्ञान भी इसमें से एक है |
लगातार होते विदेशी आक्रमणों, सदियों की गुलामी एवं संस्कृति और ज्ञान की उपेक्षा के कारण सामुद्रिक शास्त्र के उद्भव काल का ठीक ठीक पता लगाना संभव नहीं है | विदेशी लुटेरों और आक्रमणकारीयों ने हमारे बहुमूल्य ग्रंथों को तो नष्ट किया ही हजारों ग्रंथों को देश के बहार भी ले गये, परन्तु कुछ प्राप्य ग्रंथों के आधार पर कहा जा सकता है की इस विज्ञान का जन्म भारद्वाज, अत्रि, भृगु, पराशर आदि ऋषियों के पूर्व हो चूका था क्योकि इन ऋषियों के समय इस विज्ञान के प्रयाप्त विकसित होने के संकेत प्राप्त होते हैं | समुद्र नामक ऋषि ने बाद में इस विज्ञान को काफी विकसित किया इसलिए इसे सामुद्रिकी भी कहा जाता है |
वर्तमान समय में हस्तरेखा विज्ञान का काफी प्रचालन है पर सामुद्रिकशास्त्र जितनी सूक्ष्मता इसमें नहीं है यह काफी हद तक पश्चिमी विद्वानों की देन है पर विस्तार से अध्ययन करने से पता चलता है सामुद्रिकशास्त्र ही श्रेष्ठ है | इसके माध्यम से हम अगर हस्तरेखा का परिक्षण करतें हैं तो ज्यादा सटीक परिणाम प्राप्त कर सकतें हैं |