Saptam Rahasya

maa sharda ramkrishna paramhansaप्राचीन काल में भारतीय संस्कृति को देव संस्कृति कहा जाता रहा है। इसका एक बार कारण वह सम्बन्ध है जो कि भारतीय समाज और आध्यात्म के बीच रहा है, और यह प्रबंध मनुष्य को आदर्शनिष्ट बनाये रखने के लिए हर स्तर पर विवेकसंगत मालूम होता है ।

व्यक्ति और परिवार के बाद संसार की तीसरी बरी इकाई समाज है । इस इकाई में पूरी तरह आध्यात्मिक समावेश से ही देवसंस्कृति फलीभूत हो सकती है । हमारी शक्ति कुमार्गगामी न बने इसके लिए इन मूल इकाईयों (व्यक्ति, परिवार, समाज ) में आध्यात्मिक समावेश अति आवश्यक है । आध्यात्म की यही शक्ति हमें संकटों से बचाती आई है पर इस तथ्य को जानते हुए भी आज मानव समाज अनेक समस्यों से ग्रसित हो चुका है । मनुष्य पतन के रास्ते चलता प्रतीत होता है । लोगों के बीच में घनिष्टता और प्रेम में अप्रत्याशित कमी आई है । वैमनस्य और द्वेष की भावना चरम पर है ।

इसका एक सबसे बार कारण भारतीय समाज और आध्यात्म के बीच जो बिखराव आया वो हो सकता है । भारतीय समाज और आध्यात्म के बीच जो एकरूपता थी वो खत्म हो चुकी है ।

समाज की तीन मूल इकाइयाँ (व्यक्ति, परिवार, समाज ) जिन समस्याओं से ग्रसित है । महामाया एवं गुरुजनों की प्रेरणा से मैंने इन समस्याओं का विश्लेषण किया और जिन तथ्यों को पाया वे कुछ इस तरह थे –

ये संसार माया पर आधारित है । ब्रह्मा की शक्ति माया अपने आवरण और विक्षेप नामक शक्तियों के प्रभाव से इस द्वैतात्मक सृष्टी को आविर्भूर करती है, और इसी से जीवात्मा का सच्चा स्वरुप संकुचित हो जाता है उसमे अपूर्णता का भाव उत्पन्न हो जाता है । इस प्रकार जो जीवात्मा वास्तव में पूर्ण और असीम है अपूर्ण तथा सिमित भासित होता है, और यह माया की महिमा से होता है । इस माया से उपर उठकर ही हमें ‘मोक्ष’ की प्राप्ति हो सकती है । ये माया उन छः रहस्यों पर टिकी है जिसे मनुष्य जीवन भर समझने का प्रयत्न करता है पर अंततः इन्हीं रहस्यों को समझने में रह जाता है और ‘मोक्ष’ से उसकी दुरी बनी रहती है । इसी सातवे रहस्य ‘मोक्ष’ को हमने ‘सप्तम् रहस्य’ कहा है ।

मनुष्य का संपूर्ण जीवन एक साधना है और वह स्वयं एक साधक । इस जीवन रुपी साधना के क्रम में मानव विभिन्न प्रकार के कर्मों के द्वारा परिष्कृत होता जाता है । इसी क्रम में वह उन छः रहस्यों को समझता है जो ‘मोक्ष’ प्राप्ति के कारक हैं ‘मोक्ष’ प्राप्ति किसी भी आत्मा की संपूर्ण सिद्धि है, वह उन बाईस सिद्धियों से ऊपर है जो ‘नारायण’ क्षेत्र के कठोर तप से प्राप्त होती है । जन्म, मृत्यु, सत्य, असत्य, प्रेम, और आस्था ये छः रहस्य हैं जिनको समझने के उपरांत मनुष्य सांतवे रहस्य ‘मोक्ष’ की ओर अग्रसर होता है । उसमें द्वेष, घृणा, वैमनस्य, क्रोध, मोह, लोभ, भय आदि दुर्गुणों का नाश हो जाता है । अंततः उस आदि शक्ति में विलीन होकर जीवन मरण से मुक्त हो जाता है ।

मानव शरीर एक वृक्ष के सामान है । उसपर आत्मा और परमात्मा नाम के दो पक्षी हैं । जब आत्मा कर्म करता है तो परमात्मा उसे देखता है । उसके बुरे कर्मों पर उसे रोकता है पर अज्ञानता वश भौतिक सुखों की पूर्ति के लिए मनुष्य परमात्मा की आवाज को दरकिनार कर पाप का भागी बनता है और आत्मोपलब्धि से दूर होता जाता है । पर आत्मा की पूर्ण शुद्धि तो आत्मोपलब्धि से ही हो सकती हैं ।

सप्त रहस्यों का विश्लेषण

मैंने जो इन सप्त रहस्यों की चर्चा की है ये सभी रहस्य जीव की नित्त्यता को ही प्रमाणित करतें हैं । उनके मूल आपस में बड़ी सुन्दरता से गुथे हुए हैं । आवश्यकता है की हम उन तत्वों का चिंतन कर मन और प्राण को संयमित कर निर्मल अन्तःकरण को प्राप्त करें ।

“जीवन और मृत्यु का जो अमृतमय अनुभव है वह सत्य और असत्य के मध्य में आत्मज्ञान और भक्तिज्ञान का दीपक जलाकर प्रेम और आस्था का प्रकाश फैला देता है ।”

परन्तु जीवन और मृत्यु के इस अमृतमय रहस्य को न समझ सकने के कारण जीव मोक्ष और चैतन्यता से दूर भटकता रहता है । वह अपनेआप को सिमित मान लेता है । उसके अन्तःकरण में उस ब्रह्मतत्व की ओर बढ़ने की कोई अभिलाषा नहीं होती पर जैसे ही जीव इस रहस्य को समझ जाएगा उसके अंदर की भावना परिवर्तित हो जाएगी । सर्वत्र व्याप्त जो मंगलमय सत्य (मैं ही अनंत ब्रहम्मांडो में व्याप्त होकर सभी क्रियाएं कर रहा हूँ मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है मैं परमानन्द हूँ अमर हूँ अनंत हूँ अनादि सच्चिदानंद परमात्मा हूँ मैं ही शिव हूँ ।)है और जो असत्य है जीव के समक्ष प्रकट हो जाएगा । साधारण शब्दों में अगर हम आरम्भ करें तो सबसे पहले जो बड़ी आसानी से समझने योग्य बात है की

  • पंचमहाभूतों से बने स्थूल शरीर का सूक्ष्म शरीर से संयोग जीवन और वियोग मृत्यु है (सांसारिक दृष्टी से) ।
  • अपने आत्म स्वरुप में स्थित होना जीवन और आत्मभाव से दूर जीवभाव में आ जाना मृत्यु है ।
  • हर पल अपनी स्मृति में अपने इष्ट को स्थापित रखना अर्थात अपने इष्ट की स्मृति जीवन और अपने स्मृति से निकाल देना इष्ट भाव से अलग हो जाना अर्थात इष्ट की विस्मृति मृत्यु है ।
  • निर्भयता जीवन है भय मृत्यु है ।
  • क्रियाशीलता जीवन और शिथिलता मृत्यु है ।

मूल रूप से न तो जन्म है और न ही मृत्यु । हम जिसे जीवन समझतें हैं वह जीवन नहीं है और जिसे मृत्यु समझतें हैं वह मृत्यु नहीं है । केवल प्रकृति में परिवर्तन हो रहा है । जो पैदा होता दिखता है वही नष्ट हो रहा है जो सृजित हो रहा है वही विसर्जित होता दिख रहा है । यह शरीर प्रतिदिन परिवर्तित हो रहा है प्रतिदिन शरीर के पुराने कोष नष्ट हो रहें हैं और उसकी जगह नए कोष बनते जा रहें हैं ।

पुरुष और प्रकृति ये दो हैं । इनमें पुरुष कभी परिवर्तित नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तन रहित नहीं होती । प्रकृति के इसी स्वरुप को हम जीवन और मृत्यु के रूप में परिभाषित कर देतें हैं । जो कुछ हमारे अनुकूल घटता है वह जीवन और जो प्रतिकूल है वह मृत्यु प्रतीत होता है । पर वास्तव में यह सिर्फ प्रकृति रूपांतरण मात्र है ।

संपूर्ण ब्रह्माण्ड उर्जा का रूप है । प्रकृति की संपूर्ण क्रिया उर्जा की तरह कार्य करती है । जिस तरह उर्जा का क्षय नहीं होता रूपांतरण हो जाता है उसी तरह प्रकृति का भी केवल रूपांतरण होता है ।

इस तथाकथित मृत्यु से सभी भयभीत रहते हैं । अज्ञानवश जीवन में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश जैसे क्लेश दृष्टी गोचर होते हैं पर जीवन और मृत्यु के मूल में जो आनंद है उसका दिव्य सोपान ही मनुष्य को परिष्कृत और पुष्ट करता है एवं जीव परमात्मा में विलीन हो पूर्ण सिद्ध होकर परमानन्द को प्राप्त करता है ।

bali vad hभगवान् श्री राम ने जब बाली का वध किया तो बाली की पत्नी श्री राम के पास आकर अपने पति के वियोग में फूटफूट कर रोने लगी । श्री राम ने उन्हें इन शब्दों के माध्यम से समझाया –

क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा ।

सो तनु तव आगे सोहा जीव नित्य तू कहाँ लगि रोवा ।।

अर्थात तू किसके लिए विलाप कर रही है, शरीर के लिए या जीव के लिए पंचमहाभूतों के द्वारा रचित शरीर के लिए यदि तू रोती है तो यह तेरे सामने पड़ा है । और यदि जीव के लिए रोती है तो जीव नित्य है वह मरता नहीं है ।

अगर वास्तव में मृत्यु होती तो कई बार होने वाली मौत के साथ हम तो मर चुके होते । अपने कर्मो के माध्यम से आत्मा को परिष्कृत और पुष्ट करना जिससे जीव मुक्त हो जाए जीवन और बन्धनों में बंधे रहना प्रतिदिन अपने स्थूल शरीर से जुड़े सुक्ष्म शरीर को निर्बल बनाना मृत्यु है ।

जीव को परिष्कृत होने के लिए कई योनियों से होकर गुजरना पड़ता है । चोरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद उसे मनुष्य का शरीर जो जीव को मुक्त करने का एक माध्यम है प्राप्त होता है । मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार उसे उपलब्ध होते हैं । उसे एक वैचारिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है, जिसे विवेक के माध्यम से संयमित करके मनुष्य मुक्त हो जाता है और परमात्मा में विलीन होकर परमानन्द को प्राप्त करता है ।

भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा है

krishna arjun samwaadवासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।

अर्थात तू शरीरों के वियोग का शोक करता है तो यह भी उचित नहीं है क्योकि जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्रों का त्याग कर दुसरे नए वस्त्रो को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर का त्याग कर नए शरीरों को प्राप्त करता है ।

कई बार शरीर धारण करने और त्यागने के उपरांत जैसे जैसे आत्मा पुष्ट होती है वैसे वैसे उसे पहले से अधिक योग्य देदीप्यमान नए शरीर मिलते जाते हैं । जीवजंतुओं से विकसित होते होते बन्दर, गाय, आखिर में मनुष्य देह मिलती है । जब मनुष्य दिव्या कर्म करता है सत्वगुण प्रधान होकर देव और गन्धर्व की योनि पता है । राजस प्रभाव होने से फिर मनुष्य में तथा तामस प्रभाव होने से फिर हल्की योनियों में जाता है ।पर सत् विचारों सत् गुणों एवं सत्कर्मों के द्वारा परिष्कृत और पुष्ट आत्मा मुक्त हो जाती है ।

परमात्मा से दुरी मृत्यु और संगति जीवन है । जीवन के सन्दर्भ में सांसारिक दृष्टिकोण से मृत्यु एक पड़ाव है एक विश्राम स्थल है । इसमें भय नहीं होना चाहिए । यह प्रकृति की निरंतर चलती वयवस्था है एक रूपांतर मात्र है ।

जिस प्रकार दिन भर थका हुआ व्यक्ति रात्रि को नींद लेकर अगली सुबह जगता है तो एक स्फूर्ति का अनुभव करता है । उसी प्रकार अपना जीर्ण शीर्ण स्थूल शरीर छोरकर जीव पहले से अधिक देदीप्यमान शरीर धारण करता है ।

जीवन मृत्यु के इस रहस्य की व्याख्या हमें कई निष्कर्षों तक ले जाती है

मैं शरीर मन बुद्धि नहीं अपितु आत्मा हूँ । अगर जीव इस रहस्य को समझ सके तो सृजन और विसर्जन के भय सृष्टी और संहार के भय से मुक्ति मिल जाएगी । क्यों की आत्मा का स्वभाव है –

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।

यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्त्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योकि यह अजन्मा नित्य सनातन और पुरातन है । शरीर के मरे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता ।

हम अपने वास्तविक स्वरूप और असीम क्षमता को नहीं जानते और अविद्या आदि क्लेशों से प्रभावित रहते हैं पर असल में जीव अमर है अनंत है अनादि सच्चिदानंद परमात्मा है शिव है ।

aadi guru sankaracharyaआदिगुरू शंकराचार्य ने भी इस सातवें रहस्य (मोक्ष) तक पहुचने के लिए छः संपत्तियों को बताया है । शम दम उपरति तितिक्षा श्रद्धा और समाधान ये छः रहस्य (संपत्तियां) हैं । मोक्ष साधना इन छः संपत्तियों की साधना आवश्यक है जिससे साधक को मोक्ष की पात्रता प्राप्त होती है इनकी साधना के बिना मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं होता बिना साधना के साधन की उपलब्धि नहीं होती जो बिना किसी साधना के मोक्ष प्राप्ति की इच्छा करतें हैं वो सौ जन्मों में भी इसे नहीं प्राप्त कर सकते हैं । अतः हमें चाहिए की अपने जीवन में आत्मचिंतन करें और उन रहस्यों को समझने का प्रयत्न करें तभी हमारी आत्मा पुष्ट होगी और हम मोक्ष प्राप्त कर सकतें हैं । अपने जीवन में अच्छे कर्मों का समावेश कर वैमनस्य की भावना का त्याग कर प्रेम और स्नेह का प्रकाश फैला सकते हैं ।

  1. शम – मन को वश में करना की शम है । मनुष्य का शरीर एक यन्त्र मात्र है मन के इच्छा के अनुसार ही शरीर कर्म करता है संसार के सभी अच्छे बुरे कर्म मन से ही होते हैं 
  2. दम – चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियों को वश में करना दम है । मन में कामना वासना है किन्तु वे किसी आलंबन को पाकर ही उत्तेजित होती है इसलिए इन्द्रियों को वश में करना चाहिए ।
  3. उपरति – अपने धर्म का पालन या अनुष्ठान करना ही उपरति है उपरति से मन ब्रह्म में केन्द्रित हो जाता है ।
  4. तितिक्षा – सर्दी गर्मी दुःख सुख आदि में समानता रखना ही तितिक्षा है ।
  5. श्रद्धा – गुरु और वेदांत की बातों पर विश्वास रखना ही श्रद्धा है ।
  6. समाधान – चित्त की एकाग्रता ही समाधान है चित्त में वासना है जिससे वह उनकी पूर्ति के लिए विषयों की और भागता रहता है चित्त को एकाग्र करने पर यह विषयों की और नहीं भागता जिससे समस्याओं का समाधान हो जाता है ।

सप्त रहस्यों का विश्लेषण हमेशा जीव की नित्यता का प्रमाण देती रहेगी सत्य प्रेम और आस्था के दिव्य प्रकाश में ‘मोक्ष’ के अमृतमय अनुभव का सोपान कराती रहेगी ।