Shree Kalyan Mitra Quotes

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हम चाहते हैं की प्रत्येक मनुष्य ईश्वरीय गुणों से संपन्न हो जाए | प्रत्येक मनुष्य एक मानव के रूप मे नहीं बल्कि एक महामानव के रूप में प्रकृति में निवास करे | उसका संपूर्ण व्यक्तित्व सबल सहज और समर्थ हो| अस्वस्थ ( स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से अशक्त ) होकर जीने का अर्थ पाप ही हो सकता है | हम चाहते है की मनुष्य अपने स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण इन तीनों रूपों के विकास को उसके चरम पर स्थापित कर सके ।

omआवश्यकता से अधिक धन संग्रह न करना जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओ के अतिरिक्त अन्य का त्याग करना ही धर्म है। समय, धन, समृद्धि, प्रेम, आस्था जो कुछ भी आपके पास है उसका दान कर देना ही त्याग धर्म है किसी भी तरह की आसक्ति नहीं होने चाहिए व्यक्ति के उत्तम चरित्र निर्माण के लिए यह परम आवश्यक है |

omसांसारिक भोगों को प्राप्त करने के लिए प्रारब्ध उत्तरदायी है धन का आना हमेशा प्रारब्ध पर निर्भर करता है सिर्फ इच्छा करने से समृद्धि नहीं आती इसीलिए आवश्यक है की हम अच्छे आदर्शों और संस्कारों का भी संचय करें |

omजो मनुष्य अपने सिद्धांतों का पक्का और दृढ स्वभाव वाला होता है और संघर्षशील जीवन और निराशाओं में भी ईश्वर में आस्था रखता हैं और आशावादी होता है वही धर्म को जानने वाला है |

omईश्वर जितना सज्जन मनुष्य के अंदर है उतना ही दुष्ट मनुष्य के अंदर भी है क्योकि भगवान् हर एक मनुष्य की आत्मा में निवास करतें हैं अतः अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश जैसे क्लेशों को मन में स्थान न देकर उचित प्रयत्न करने से दुर्जन भी सज्जन बन जाते हैं ।

omवे मनुष्य जो जीवन गठन की साधना में जीवन के गूढ़ दायित्वा के बारे में सोंचते हैं और सभी अवस्थाओं में धर्म जीवन में उन्नति करना चाहते हैं धर्म कहता है की मानव बोध का गठन उनका प्रथम कर्त्तव्य है ।

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भारतीय संस्कृति की आधारशिला देवसंस्कृति है भौतिकवादी जड़ संस्कृति भारतीय नहीं है अतः आलस्य, जड़ता, उदासीनता, निंद्रा, तन्द्रा और प्रमाद को दूर कर स्वयं को प्रबल कर्मशक्ति से युक्त करना होगा ।

omधर्म कहता है की हम अमृत के अधिकारी हैं पर मानव गठन के सनातन व्यवस्था का अनुशरण करने से, सत्य के दिव्य प्रकाश में जीवन के क्लेशों का त्याग करने से और प्रकृति के सूक्ष्म नियमों के अनुकूल व्यवहार करने से ही यह संभव है ।

omब्रह्मण्डीय चेतना की स्थिति अकाट्य और अनंत है, और वह पदार्ध में होकर भी पदार्थ से भिन्न है, आत्मा अनंत ज्ञान है, इस ब्रह्मण्डीय तत्वदर्शन के आधार पर इसकी पुष्टि होती है, यही प्रकृति का एक सार्वभौमिक नियम है ।

omसभी प्राणियों का उनके सफल एवं श्रेष्ट जीवन के लिए सुसंगठित होकर संघर्षरत एवं प्रयत्नशील रहना परम आवश्यक है ।

omसनातन जीवन के पवित्र उद्देश्यों और लक्ष्यों के प्रति जिन मनुष्यों की आस्था है वे निश्चित ही पर्वत के सामान अटल , दृढ स्थिर और कर्त्तव्य साधन के माध्यम से जीवन के आदर्शों को स्थापित करने वाले हैं ।

omये संसार माया पर आधारित है । ब्रह्मा की शक्ति माया अपने आवरण और विक्षेप नामक शक्तियों के प्रभाव से इस द्वैतात्मक सृष्टी को आविर्भूर करती है, और इसी से जीवात्मा का सच्चा स्वरुप संकुचित हो जाता है उसमे अपूर्णता का भाव उत्पन्न हो जाता है । इस प्रकार जो जीवात्मा वास्तव में पूर्ण और असीम है अपूर्ण तथा सिमित भासित होता है, और यह माया की महिमा से होता है । इस माया से उपर उठकर ही हमें आत्मोपलब्धि हो सकती है ।

omपुरुष और प्रकृति ये दो हैं । इनमें पुरुष कभी परिवर्तित नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तन रहित नहीं होती । प्रकृति के इसी स्वरुप को हम जीवन और मृत्यु के रूप में परिभाषित कर देतें हैं । जो कुछ हमारे अनुकूल घटता है वह जीवन और जो प्रतिकूल है वह मृत्यु प्रतीत होता है । पर वास्तव में यह सिर्फ प्रकृति रूपांतरण मात्र है ।

omचेतना का अनंत विस्तार ईश्वर भक्ति से युक्त मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है ईश्वर का कोई भी विचार मन को सजग स्तर से गहरे सुक्ष्म स्तर भावातीत शुद्ध चेतना में प्रवाहित कर देता है

omप्राचीन प्रभावशाली व्यक्तित्व की आधुनिक आन्तरिक कुंठा सार्वजनिक जीवन में उनके धार्मिक प्रवृति को नष्ट भ्रष्ट कर चुकी है , धर्म को जाननेवाले ही धर्म को सबसे ज्यादा नुकसान पंहुचा रहे हैं वो लोग जो ईश्वर की अनुभूति सिर्फ अनित्य वस्तुओं में बताकर जीवन को चैतन्यता के मार्ग से विमुख कर रहे हैं निश्चय ही अनर्थ कर रहे हैं ।

omसमस्त जीव परमात्मा के सामान अंशी और आत्मीय हैं आध्यात्मिक चेतना की रश्मियाँ भिन्न भिन्न आयामों में परमात्मा के चैतन्य और आनंदमय स्वरूप को निरंतर प्रकट करती हैं इस परम तत्व का बोध निष्ठा पूर्वक साक्षीभाव से करना होगा ।

omजीवन में अनुशासन नैतिक और बौद्धिक शिक्षा का अविभाज्य अंग है, अनुशासन व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन का प्राण है, मुक्त और परिष्कृत होना मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है और अनुशासन उस मुक्त और प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य का मार्ग है ।

omभारत के निर्माण में युवाओं की अहम भूमिका है पर आज लगातार हो रहे नैतिक और शैक्षणिक पतन के कारण युवा वर्ग अपने पतन के मार्ग पर अग्रसर है इस प्रतिकूल समय में आवश्यक है की शिक्षक और तंत्र दोनों ही वर्तमान शिक्षा पद्धति में आध्यात्म का समावेश करें , आध्यात्म से नैतिकता और सुदृढ़ संस्कारो का विकाश होगा जो की भारत को विश्वगुरु होने के पथ पर अग्रसर करेगा ।

omव्यक्तिगत एवं सार्वजनिक रूप से अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह, विनम्रता, आदर व श्रद्धा का अर्पण ही श्राद्ध है मनुष्य अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। पर ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक का ज्ञान, स्नेह और संम्पत्ति विरासत में पायी है और उससे प्रेम और आदर भाव रखता है, उस व्यक्ति का स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। गुरु से विद्या प्राप्त करने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है।

omआद्याशक्ति की कृपा से समस्त सृष्टि की क्रियाएँ संचालित होती रहती हैं शक्ति की उपासना मनुष्य को उसके आत्मशक्ति की महासत्ता का बोध कराती है समस्त सनातन धर्मियों को नवरात्री के पावन, दिव्य और शुभ रातों में शक्ति की साधना एवं उपासना पूरी श्रद्धा और भक्ति से करनी चाहिए क्योकि माँ आद्याशक्ति के लोककल्याणकारी नवरूपों की उपासना भारतवर्ष की गौरवमयी संस्कृति का आधार है ।

omआधुनिक काल में मुक्त भोग की अनियंत्रित प्रवृति से देश के युवा व्यावहारिक जीवन में आत्मिक अवनति के मार्ग पर उन्मुक्त रूप से बढ़ रहे हैं पर संयम और पुरुषार्थ के बिना मनुष्य के संस्कारो की शुद्धि संभव नहीं है, शुुद्ध आत्म तत्व की प्राप्ति संयम से ही संभव है इसीलिए सनातन धर्म की नीतिपरक प्रक्रियाओं में साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम का समावेश किया गया है ।

omरचनात्मक, सत्यनिष्ठ, और परिश्रमी व्यक्ति सत्य का त्याग कर इंद्र के सिंघासन और कुबेर की संम्पत्ति की अभिलाषा कभी नहीं रखते क्योकि ,धन,बुद्धि,पद,रूप,यौवन और इन्द्रियों की अनुभूति निरंतर एक जैसी नहीं रह सकती परन्तु सत्य सदैव नित्य रहता है और परिश्रम जीवन और प्राण दोनों को दिव्य बना देता है ।

omदीपोत्सव भारतीय मनोभूमी से अत्यंत घनिष्ट भाव से जुड़ा है जो भारतीयों को धर्म और श्रद्धा के मार्ग की प्रेरणा देता है, आत्मत्याग और पुरुषार्थ की प्रेरणा देती ज्योतिशिखाओं से सम्पूर्ण भारतवर्ष अनंत काल तक प्रकाशवान रहेगा, सत्य सनातन वैदिक धर्म को आलोकित करने, सघन अंधकार के अवसाद से युद्ध कर जीवन को प्रकाश, उत्साह, और हर्ष से पूर्ण करने के इस अलौकिक पर्व पर सभी सनातन धर्मियों को हार्दिक बधाई ।

omपरमार्थ की सीख देती दीपशिखाओं का उल्लास और उत्साह अपने चरम पर है । कहते है की परोपकार की भावना यश देती है और परमार्थ धर्म की सिद्धि, दीपों के इस पावन पर्व पर परोपकार और परमार्थ की सीख लेना श्रेष्ठ है न की कुंठित कामनाओं का सृजन और संरक्षण ।

omसभी छठ व्रतिओं ने पहला अ‌र्घ्य आज अस्तांचल गामी भगवान सूर्य को दिया तथा इसी के साथ प्रेम श्रद्धा आस्था और आत्मिक उत्कर्ष के इस लोकपर्व पर परिवार और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के सुख सौभाग्य में वृद्धि की कामना लोकप्रिय लोकगीतों के माध्यम से करते हुए उदयमान सूर्य की प्रतीक्षा प्रारंभ कर दी है । यह सन्देश देते हुए की डूबना अंत नहीं है, डूबना और उगना निरंतर चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है, जो नित्य नई संभावनाओं के मार्ग प्रशस्त करती है सभी छठ व्रतियो को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ इस सूर्य पर्व की शुभकामनाएँ देता हूँ ।

omजीवन अनोखा है, यह व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही रूपों में विद्यमान है और ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में हर पल हमें नवीन उत्साह के साथ महान परिणामों की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता रहता है ।

omजीवन की मौलिक प्रस्तुति और उसके अस्तित्व की पूर्णता का प्रत्यक्ष प्रमाण ही हमारी वैदिक परंपरा का आधार है, क्योकि यह केवल कर्तव्यबोध ही नहीं करती बल्कि उन्हें पूर्ण करने का मार्ग भी बताती है ।

omमनुष्यता जीव को उच्च से उच्चतर स्थिति तक ले जाने की परंपरा का निर्वाह करती है, इस परंपरा का तिरस्कार करने वाले असफल जीवों को यह बात समझनी चाहिए की सासांरिक प्रपंचो में लिप्त होकर अपने देव दुर्लभ मनुष्य जीवन को पशुवत् भोगों को भोगने में ही नष्ट ना करें बल्कि नैतिक आचरण, चरित्र, स्वास्थ्य, प्रेम व शांति से जीवन को समृद्ध करने का पुरुषार्थ करे ।

omसार्थक जीवन आध्यात्मिक गुणों से परिपूर्ण होने की अभिलाषा मात्र से नहीं जीया जा सकता, बल्कि सशक्त रूप से धर्म कर्तव्यों का भार भी वहन करना होगा ।

omजीवन का परिष्कार अत्यन्त दुष्कर यौगिक प्रक्रिया है, इस प्रक्रिया में जीवन में होते आन्तरिक संघर्ष जीवात्मा को अत्यन्त दक्ष, तीव्र एवं निपुण कर ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अनुभव प्रक्रिया द्वारा आत्मबल और तेजबल की वृद्धि करते हैं जिससे जीव मुक्त हो जाता है और नित्य आनंद को पाता है यहाँ आन्तरिक संघर्षों का आशय नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की प्रवृत्तियों के द्वन्द से हैं जो जो मनुष्य अपने सिद्धांतों का पक्का और दृढ स्वभाव वाला है वही इन द्वंदों से सकारात्मक विजय प्राप्त कर सनातन धर्म की वैशिष्ट्यता का प्रमाण देता है ।

om“आध्यात्म” जीवन की गरिमा, उसकी क्षमता और उसमे निहित अनंत आनंद का विस्तार कर संस्कृति का निर्माण करती है जिसमे सत्य, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य का आन्तरिक समावेश होता है, जिसे हम धर्म कहते हैं उसके दो आयामों आध्यात्म और संस्कृति का यही सार्वभौमिक स्वरुप है ।

omयोग साधनाओं के क्रम से प्राप्त निर्वाण महेश्वेर पद कहा जाता है उस निर्वाण का हेतु रूद्र का ज्ञान हो जाना ही है और वह ज्ञान उन्हीं की कृपा से होता है | जो सभी इन्द्रीओं को नियंत्रित करके उस ज्ञान से पापों को जला डालता है , इन्द्रिओं की वृतियों पर नियंत्रण रखने वाले उस प्राणी को योग की सिद्धि आवश्य प्राप्त होती है | चित्त की वृतियों का नियंत्रण ही योग है | योग के आठ अंगों का अनुष्ठान करने से, उनको आचरण में लेने से चित्त के मल का अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है | यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये आठ योग के अंग हैं |

omचरित्र की दुर्बलता अनावश्यक दुखों का कारण हैं, चेतना को बाह्य जगत से अन्तः जगत पर केन्द्रित कर उसे सबल बनाया जा सकता है मनुष्य व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में जिस किसी परिस्थिति में नवजीवन के सृजन का प्रयास करता है उसमे सफलता चरित्रबल के द्वारा ही संभव है ।

omअवचेतन मन की चेतन शक्ति को प्रकट करना आध्यात्म, निर्लिप्तता के साथ आत्म भाव में जीना जीवन की शास्वत शैली और धर्म के साथ अर्थ का अर्जण कर काम और मोक्ष हेतु पुरुषार्थ करना जीवन की मर्यादा है सनातन धर्म ने आध्यात्म का विकाश इसी मर्यादा की रक्षा के लिए किया है ।

omसमस्त सृष्टि में एक अलौकिक तथा वृहद् चेतना ब्रह्मांडीय उर्जा के रूप में व्याप्त है, जिसकी स्थिति अकाट्य और अनंत है, वह पदार्ध में होकर भी पदार्थ से भिन्न है इस विराट चेतन उर्जा के कारण ही संसार के समस्त प्राणी और जड़-चेतन पदार्थ पृथक्-पृथक् होकर भी सृष्टि का ही एक अभिन्न अंग हैं और चेतना के स्तर पर आपस में जुड़े हैं। ब्रह्माण्डीय चेतना जीव के अवचेतन मन के माध्यम से ही प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हो सकती है, जीव चेतन से अर्धचेतन और अवचेतन में पहुँच कर प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है और ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्बद्ध होकर अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न बन जाता है। चेतना का अनंत विस्तार निर्विकार, वासनारहित, कामनारहित, दृढ़संकल्पी सतोगुणी और ईश्वर भक्ति से युक्त मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है। ईश्वर का कोई भी विचार मन को सजग स्तर से गहरे सुक्ष्म स्तर भावातीत शुद्ध चेतना (अवचेतन मन) में प्रवाहित कर देता है । अवचेतन मन की चेतन शक्तियों को पूर्ण विकसित करके मनुष्य समस्त जीव जगत अथवा जड़-चेतन पदार्थ और सम्पूर्ण प्रकृति को ही अपने अनुकूल बना सकता है ।

omआध्यात्म मनुष्य का स्वभाव है । जीवन में चेतन शक्ति का विकाश करना या चेतन शक्ति को प्रकट करना आध्यात्म है । आध्यात्म का मनुष्य के जीवन में सिर्फ उपयोगिता नहीं बल्कि आध्यात्म मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है । मनुष्य विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में’प्रवेश करता है, इस रूप में वह व्यक्तिगत, सामाजिक, नैतिक, आर्थिक कई तरह के कर्तव्यों का पालन करता है । जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सारे संस्कार मनुष्य इसी आश्रम में पुरे कर सुसंस्कृत और पवित्र बनता है एवं धर्म अर्थ काम की प्राप्ति करता है जिसे हम धर्म कहते हैं उसके दो आयाम हैं आध्यात्म और संस्कृति । “आध्यात्म” जीवन की गरिमा, उसकी क्षमता और उसमे निहित अनंत आनंद का विस्तार कर संस्कृति का निर्माण करती है । जिसमे सत्य, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य का आन्तरिक समावेश होता है । जीवन में सत्य, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य का समावेश कर चेतन शक्ति का विकाश किया जा सकता है ।

omधर्म वह सनातन मार्ग है जिसपर चलते हुए मनुष्य मन, वचन और कर्म से दूसरों को कष्ट दिये बिना अभ्युदय और नि:श्रेयस की सिद्धि करता है ।

omधर्म से युक्त वह मनुष्य जो अपनी आत्मा के मनन और दर्शन से आत्मतत्व को प्राप्त कर लेता है और फिर उस आत्मतत्व के दीप्त ज्ञान से ब्रह्मतत्व के दर्शन करता है वह मुक्त है ।