Stotra

आदित्य हृदयस्तोत्रम्

surya dev

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् l
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ll
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्l l
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ll
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् l
येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ll
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् l
जयावहं जपेन्नित्यं अक्ष्य्यं परमं शिवम् ll
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् l
चिंताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ll
रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् l
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ll
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः l
एष देवासुरगणाँल्लोकां पाति गभस्तिभिः ll
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः l
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमोह्यपां पतिः ll
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः l
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ll
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् l
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ll
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् l
तिमिरोन्मथनः शंभुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ll
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः l
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ll
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः l
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ll
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः l
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ll
नक्ष्त्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः l
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ll
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः l
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ll
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः l
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ll
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः l
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ll
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे l
भास्वते सर्वभक्षय रौद्राय वपुषे नमः ll
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने l
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ll
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे l
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ll
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः l
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ll
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः l
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ll
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च l
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ll
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च l
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ll
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् l
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ll
अस्मिन्क्शणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि l
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ll
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा l
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ll
आदित्यं प्रेक्श्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवां l
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ll
रावणं प्रेक्श्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् l
सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ll
अथ रविरवदन्निरीक्श्य रामं l
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ll
निशिचरपतिसंक्शयं विदित्वा l
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ll

बजरंग बाण

hanumaan ji

दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करै सनमान ।
तेहि कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान  ll
चौपाई
जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुनि लीजै प्रभु बिनय हमारी  ll
जन के काज विलंब ना कीजै ।
आतुर दौरि महासुख दीजै  ll
जैसे कूदि सिंधु के पारा ।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा  ll
आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुरलोका  ll
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परम पद लीन्हा  ll
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा  ll
अछय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेट लंक को जारा  ll
लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई  ll
अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अंतरजामी  ll
जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता  ll
जय हनुमान जयति बल सागर ।
सूर समूह समरथ भट नागर  ll
ऊँ हनु हनु हनु हनुमंत हठीलै ।
बैरिहि मारु वज्र की कीलै  ll
ऊँ हीं हीं हीं हनुमंत कपीसा ।
ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उस सीसा  ll
जय अंजनि कुमार बलवंता ।
संकरसुवन बीर हनुमंता  ll
बदन कराल काल कुल घालक ।
राम सहाय सदा प्रतिपालक  ll
भूत, प्रेत, पिसाच, निसाचर ।
अगनि बेताल काल मारी मर  ll
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की ।
राखु नाथ मरजाद नाम की  ll
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै ।
रामदूत धरु मारु धाइ कै  ll
जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दुख पावत जन केहि अपराधा  ll
पूजा जप तप नेम अचारा ।
नहि जानत कछु दास तुम्हारा  ll
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं  ll
जनकसुता हरि दास कहावौ ।
ता की सपथ, बिलंब न लावौ  ll
जय जय जय धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा  ll
चरन पकरि, कर जोरि मनावौ ।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं  ll
उठ, उठ, चलु, तोहि राम दौहाई ।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई  ll
ऊँ चम चम चम चम चपल चलंता ।
ऊँ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता  ll
ऊँ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल  ll
अपने जन को तुरत उबारौ ।
सुमिरत होय अनंद हमारौ  ll
यह बजरंग बाण जेहि मारै ।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै  ll
पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रच्छा करैं प्रान की  ll
यह बजरंग बाण जो जापैं ।
तासों भूत प्रेत सब काँपै  ll
धूप देय जो जपै हमेसा ।
ता के तन नहिं रहै कलेसा  ll
दोहा
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै ध्यान ।
बाधा सब हर, करै सब काम सफल हनुमान  ll

शिव तांडव स्त्रोत्र 

shiv-tandav

जटाटवी-गलमज्जल-प्रवाहपावितस्थले, गलेsवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंग-मालिकाम ।
डमड्ड्मड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव: शिवम  ll
जटाकटाह-सम्भ्रमभ्रमन्निलिम्प-निर्झरी, विलोलवीचि-वल्लरी-विराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाट-पट्टपावके, किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम  ll
धराधरेन्द्रनन्दिनी-विलासबन्धुबन्धुर, स्फुरद्दिगन्न्तति-प्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि,व्कचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि  ll
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा, कदम्बकुंकुमद्रव-प्रलिप्त-दिग्वधूमुखे ।
मदान्ध-सिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे, मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि  ll
सहस्त्रलोचन-प्रभृत्य-शेषलेखशेखर, प्रसूनधूलिधोरणी-विधूसरांगघ्रिपीठभू: ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटक:, श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखर:  ll
ललाट-चत्वरज्वलद्धनण्जय-स्फुलिंगभा, निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं, महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु न:  ll
करालभालपट्टिका-धगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया-हुतीकृत-प्रचण्डपंचसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनी-कुचाग्रचित्रपत्रक, प्रकल्पनैक-शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम  ll
नवीनमेघमण्डली-निरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतम:प्रबन्धबद्धकन्धर: ।
निलिम्पनिर्झरी-धरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुर:, कलानिधानबन्धुर: श्रियं जगदधुरन्धर:  ll
प्रफुल्लनीलपंकज-प्रपंचकालिमप्रभा-वलम्बिकण्ठकन्दली-रुचिप्रबद्धकन्धरम ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं, गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे  ll
अखर्वसर्वमंगला-कलाकदम्बमंजरी, रसप्रवाहमाधुरी-विजृम्भणामधुव्रतम ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं, गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे  ll
जयत्वदभ्र-विभ्रम-भ्रमद-भुजंगमश्वस, द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्कराल-भालहव्यवाट ।
धिमिद्धिमिद्धिमिदध्वनन मृदंगतुंगमंगल, ध्वनिक्रम-प्रवर्तित-प्रचण्डताण्डव: शिव:  ll
दृषद्विचित्रतल्पयो-र्भुजंगमौक्तिकस्त्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयो: सुहृद्विपक्षपक्षयो:।
तृणारविन्दचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो:, समप्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम  ll
कदा निलिम्पनिर्झरी-निकुंजकोटरे वसन, विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमण्जलिं वहन ।
विलोल-लोल-लोचनो ललाम-भाल-लग्नक:, शिवेति मंत्रमुच्चरन कदा सुखी भवाम्यहम  ll
इमं हि नित्यमेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं, पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम ।
हरे गुरौ सुभक्ति माशु याति नान्यथा गतिं, विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम  ll
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं, य: शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र-तुरंगयुक्तां, लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भु:  ll

संकट मोचन हनुमाष्टक

hanumaan

बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो ।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात ना टारो ।।
देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 1 ।।
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिय कौन बिचार बिचारो ।।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु , सो तुम दास के सोक निवारो ।।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 2 ।।
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जू, बिन सुधि लाए इहाँ पगु धारो ।।
हेरि तके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया – सुधि प्रान उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 3 ।।
रावन त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो ।।
चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 4 ।।
बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो ।।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 5 ।।
रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ।।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 6 ।।
बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो ।।
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत सँहारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 7 ।।
काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहि जात है टारो ।।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कुछ संकट होय हमारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो ।। 8 ।।
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर ।
ब्रजदेह दानव दलन, जय जय जय कपि सुर ।।

बुध स्त्रोत्र

buddh-dev
चतुर्भुजो देवदु:खापहर्ता ।
धर्मस्य धृक सोमसुत: सदा मे,
सिंहाधिरुढ़ो वरदो बुधश्च  ll
प्रियंगुकनकश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं नमामि शशिनन्दनम  ll
सोमसुनुर्बुधश्चैव सौम्य: सौम्यगुणान्वित: ।
सदा शान्त: सदा क्षेमो नमामि शशिनन्दनम  ll
उत्पातरूपी जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति: ।
सूर्यप्रियकरोविद्वान पीडां हरतु मे बुधं  ll
शिरीषपुष्पसंकाशं कपिलीशो युवा पुन: ।
सोमपुत्रो बुधश्चैव सदा शान्तिं प्रयच्छतु  ll
श्याम: शिरालश्चकलाविधिज्ञ:,
कौतूहली कोमलवाग्विलासी ।
रजोधिको मध्यमरूपधृक स्या-दाताम्रनेत्रो द्विजराजपुत्र:  ll
अहो चन्द्रासुत श्रीमन मागधर्मासमुदभव: ।
अत्रिगोत्रश्चतुर्बाहु: खड्गखेटकधारक:  ll
गदाधरो नृसिंहस्थ: स्वर्णनाभसमन्वित: ।
केतकीद्रुमपत्राभ: इन्द्रविष्णुप्रपूजित:  ll
ज्ञेयो बुध: पण्डितश्च रोहिणेयश्च सोमज: ।
कुमारो राजपुत्रश्च शैशवे शशिनन्दन:  ll
गुरुपुत्रश्च तारेयो विबुधो बोधनस्तथा ।
सौम्य: सौम्यगुणोपेतो रत्नदानफलप्रद:  ll
एतानि बुधनामानि प्रात: काले पठेन्नर: ।
बुद्धिर्विवृद्धितां याति बुधपीडा न जायते  ll

मंगल स्त्रोत्र

mangal

रक्ताम्बरो रक्तवपु: किरीटी,
चतुर्मुखो मेघगदो गदाधृक ।
धरासुत: शक्तिधरश्च शूली,
सदा मम स्याद वरद: प्रशान्त:  ll
धरणीगर्भसंभूतं विद्युतेजसमप्रभम ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम  ll
ऋणहर्त्रे नमस्तुभ्यं दु:खदारिद्रनाशिने ।
नमामि द्योतमानाय सर्वकल्याणकारिणे  ll
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगा: ।
सुखं यान्ति यतस्तस्मै नमो धरणि सूनवे  ll
यो वक्रगतिमापन्नो नृणां विघ्नं प्रयच्छति ।
पूजित: सुखसौभाग्यं तस्मै क्ष्मासूनवे नम:  ll
प्रसादं कुरु मे नाथ मंगलप्रद मंगल ।
मेषवाहन रुद्रात्मन पुत्रान देहि धनं यश: ll
(इति मन्त्रमहार्णवे मंगल स्तोत्रम )

शनि स्तोत्र

shani dev

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च
नम: कालाग्नि रुपाय कृतान्ताय च वै नम:
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरे भयाकृते
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेsथ वै नम:
नमो दीर्घाय शुष्काय कालद्रंष्ट्र नमोsस्तुते
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निक्ष्याय वै नम:
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोsस्तु ते
सूर्यपुत्र नमस्तेsस्तु भास्करेsभयदाय च
अधोदृष्टे: नमस्तेsस्तु संवर्तक नमोsस्तु ते
नमो मंदगते तुभ्यं निर्स्त्रिंशाय नमोsस्तुते
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेsस्तु कश्यपात्मज – सूनवे
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध – विद्याधरोरगा
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: