Yog tantra

कुण्डलिनी जागरण (योगतान्त्रिक साधना )

yogatantraमनुष्य के शरीर मे आध्यात्मिक शक्तियों के कई महत्वपूर्ण केंद्र हैं | वास्तव में ये वह केंद्र हैं जहाँ प्राणशरीर स्थूल शरीर के साथ संयुक्त होता है जिसके कारण हमारे स्थूल शरीर में एक दिव्य उर्जा का संचार हो उठता है | जीवन का संचार हो जाता है जिसे प्राण की संज्ञा दी जाती है | योगतान्त्रिक साधनाओ में इसी प्राण शक्ति को उच्चतर स्तर तक ले जाकर हमारे शरीर के आध्यात्मिक केन्द्रों में जो बीज सुरक्षित होते हैं उनका जागरण करना होता है |

हमारे शरीर के जो आधार शिला है वह मेरुदंड है उसे रीढ़ भी कहते हैं यह मेरुदंड छोटे छोटे कई अस्थिखंडों से मिलकर बना है जिसकी संख्या तैतीस है ये खंड तैतीस देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमे आठ वसु बारह आदित्य ग्यारह रुद्र इंद्र और प्रजापति, इन तैतिसों की शक्तियां उन अस्थिखण्डों में बीज के रूप में संचित रहती है यह तत्व ज्ञान तत्वदर्शियों ने कठोर योगतान्त्रिक साधनाओं के माध्यम से प्राप्त किया है

योगतंत्र से सम्बंधित जितने भी प्राचीन साहित्य सुलभ हैं उन सभी में कहीं न कहीं सात चक्रों और कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन है इस कुण्डलिनी शक्ति और सातों चक्रों की क्रमिक साधना ही योगतान्त्रिक साधना है जिसका उल्लेख हम आगे करने जा रहे हैं

योगतान्त्रिक क्रियाओं में शरीर विज्ञान के अनुसार मेरुदंड में कई नाड़ीयां हैं जो अपने अपने कार्य में लगी रहती है पर आध्यात्म विज्ञान के अनुसार इसमें कुछ प्रमुख हैं वो तीन हैं पहली इड़ा दूसरी पिंगला तथा तीसरी सुषुम्ना, शरीर को चीरने से ये प्रत्यक्ष तो नहीं दिखाई परती क्योकि इसका सम्बन्ध सूक्ष्म जगत से है इड़ा को चन्द्र नाड़ी तथा पिंगला को सूर्य नाड़ी कहते हैं इन दोनों में ऋण और धन धाराएं सतत प्रवाहित रहती हैं पर दोनों का जब मिलन होता है तो उर्जा पैदा होती है जिससे सुषुम्ना नाड़ी जागृत हो जाती है और एक आध्यात्मिक त्रिवेणी का निर्माण हो जाता है इड़ा पिंगला की दिव्य धाराएं हैं उनके मिलने से सुषुम्ना की सृष्टी हो जाती है एक पूर्ण त्रिवर्ग का निर्माण हो जाता है

यह त्रिवेणी ऊपर मस्तिष्क के मध्यम केंद्र से, ब्रह्मरन्ध्र से, सहस्त्रार कमल से सम्बंधित और नीचे मेरुदंड का जहाँ नुकीला अंत है वह लिंगमूल और गुदा के बीच का जो स्थान है उसकी सीध में पहुँच कर रुक जाती है

योगतान्त्रिक साधनाओं के मर्मज्ञों ने सुषुम्ना नाड़ी की संरचना का बड़ा ही सूक्ष्म विश्लेषण किया है जिसे केवल चिंतन मनन पुस्तकों का अध्यन कर उपलब्ध नहीं किया जा सकता गई सुषुम्ना नाड़ी के अंतर्गत तीन सूक्ष्म धाराएं प्रवाहित होती रहती हैं जिन्हें बज्रा, चित्रणी और ब्रह्मनाड़ी कहते हैं जो केले के तने के सामान परत दर परत रहती है सुषुम्ना के भीतर बज्रा और बज्रा के भीतर चित्रणी और चित्रणी के भीतर ब्रह्म नाड़ी , मूल रूप से देखा इसी ब्रह्म नाड़ी की सुरक्षा हेतु यह सारी संरचना लगी रहती है यही ब्रह्म नाड़ी मस्तिष्क के केंद्र ब्रह्मरंध्र तक पहुँच कर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है जिस कारण से उस स्थान को सहस्त्रदल कमल कहतें हैं जिसके जागृत होने से मनुष्य की शक्तियाँ उस सुक्ष्म जगत से जुड़ जाती हैं जिससे मनुष्य परमात्मा के द्वारा प्रेषित शक्तियों को ग्रहण कर सकतें हैं वे उन्नत प्रकार की सिद्धियों को अपनी और खींच सकतें हैं

योगतान्त्रिक साधनाओं में शक्तिशाली सहस्त्रार द्वारा शक्तिशाली तरंगों को प्रवाहित करके साधारण जीवजंतुओ एवं मनुष्यों के साथ साथ लोक लोकान्तरों के सुक्ष्म तत्वों में भी परिवर्तन लाया जा सकता है

परन्तु मस्तिष्क के ब्रह्मरंध्र में बिखरे हुए सहस्त्रार प्रायः सुसुप्ता अवस्था में रहती है जबतक सुषुम्ना नाड़ी के निचले हिस्से में सोते हुए कुण्डलिनी शक्ति को योगतान्त्रिक साधनाओं द्वारा जागृत करके ब्रह्म नाड़ी में स्थित सातों चक्रों का भेदन करके सहस्त्रार तक न ले जाया जाए

कई बहुमूल्य यंत्रों और कोषों के उपलब्ध रहने पर भी मनुष्य दीन हीन बना रहता है पर इन यंत्रो से परिचित होकर उनके उपयोग को जान लेने पर परमात्मा के सच्चे उत्तराधिकार की समग्र योग्यताओं से सम्पन्न हो जाता है

कुण्डलिनी शक्ति से होने वाले लाभों के सम्बन्ध में योगशास्त्रों में काफी विस्तृत वर्णन मिलता है कुण्डलिनी शक्ति के मूल तक पहुचने के छः रास्तें हैं इन रास्तों को खोलकर ही कोई जीव उन शक्तिओं तक पहुँच सकता है उन्हें षड्चक्र कहतें हैं सुषुम्ना नाड़ी के भीतर स्थित ब्रह्म नाड़ी से वे छः चक्र सम्बंधित हैं मूलाधार चक्र योनि की सीध में, स्वाधिष्ठान चक्र पेडू की सीध में, मणिपुर चक्र नाभि की सीध में, अनाहत चक्र ह्रदय की सीध में विशुद्धाख्य चक्र कंठ की सीध में, और आज्ञा चक्र भृकुटी के मध्य में अवस्थित है उसके उपर सहस्त्रार है

षड्चक्र एक प्रकार की सूक्ष्म ग्रंथियाँ हैं जो ब्रह्मनाड़ी के मार्ग में बनी हुई हैं इन चक्र ग्रंथियों में जब साधक अपने ध्यान को केन्द्रित करता है तो उसे वह की सुक्ष्म स्थिति का अनुभव होता है ये ग्रंथियाँ गोल नहीं होती वरन् इस प्रकार के कोण निकले होते हैं, जैसे पुष्प में पंखुरियां होती हैं इन कोष या पंखुरियों को पद्मदल कहते हैं यह एक प्रकार के तंतु गुच्छक हैं इन चक्रों के रंग विचित्र प्रकार के होते हैं क्योकि किसी ग्रंथि में कोई और किसी में कोई तत्वा प्रधान होता है पृथ्वी तत्व की प्रधानता का मिश्रण होने से गुलाबी, अग्नि से नीला, वायु से शुद्ध लाल, और आकाश से धुमैला हो जाता है यही मिश्रण चक्रों का रंग बदल देता है

उन चक्रों में होता हुआ प्राण वायु आता जाता है, उसका मार्ग उस ग्रंथि की स्थिति के अनुसार कुछ टेढ़ा मेधा होता है, इस गति की आकृति देवनागरी अक्षरों से मिलती है इसीलिए वायुमार्ग चक्रों के अक्षर कहलाते हैं

द्रुत गति से बहती हुई नदी में कुछ विशेष में भवर पर जाते हैं यह पानी के भवर कही उथले, कही गहरे, कही तिरछे, कही गोल चौकोर, हो जाते हैं प्राण वायु का सुषुम्ना प्रवाह इन चक्रों से होकर द्रुत गति से गुजरता है तो वह एक प्रकार के सुक्ष्म भवर परतें हैं जिनकी आकृति चतुष्कोण, अर्धचन्द्राकार, त्रिकोण, षड्कोंण, गोलाकार, लिंगाकार, पुर्नाचंद्राकार बनती है अग्नि जब भी जलती है उसकी लो उपर की ओर उठती है जो निचे मोटी और उपर पतली होती है इस प्रकार अव्यवस्थित त्रिकोण सा बन जाता है इस प्रकार की विविध आकृतियाँ वायु प्रवाह से बनती हैं इन आकृतियों को चक्रों का यन्त्र कहते हैं

ब्रह्मनाड़ी की पोली नाली में होकर वायु का अभिगमन होता है तो चक्रों के सुक्ष्म छिद्रों के अघात से उनमें एक वैसी ध्वनि होती है जैसी बंसी में वायु का प्रवेश होने पर छिद्रों के आधार से ध्वनि उत्पन्न होती है हर चक्र के एक सुक्ष्म छिद्र में बंसी के स्वर छिद्र की सी प्रतिक्रिया होने के कारण स, र, ग, म, जैसे स्वरों की एक विशेष ध्वनि प्रवाहित होती है जो यँ, लँ, रँ, हँ, ॐ जैसे स्वरों में सुनाई पड़ती है, इसे चक्रों का बीज कहते हैं

षड्चक्रो का वेधन करके कुण्डलिनी तक पहुँचना और उसे जाग्रत करके आत्मोन्नति के मार्ग पर लगा देना यह एक महाविज्ञान है चक्रों का वेधन ध्यान शक्ति द्वारा किया जाता है ध्यान के द्वारा मन की बिखरी हुई शक्तियां एक स्थान पर एकत्रित होकर एक कार्य में लग जाती है जिसके फलस्वरूप वहाँ असाधारण शक्ति का स्त्रोत प्रवाहित हो जाता है ध्यान द्वारा मनः छेत्र की केंद्रीभूत उर्जा से साधक इन चक्रों का वेधन कर सकता है षड्चक्रों के वेधन और कुण्डलिनी के जागरण से ब्रह्मरंध्र में ईश्वरीय दिव्य शक्ति के दर्शन होते हैं और गुप्त सिद्धियाँ प्राप्त होती है कुण्डलिनी जागरण एक ऐसा हटतंत्र है जिसके आधार पर आत्मा तुच्छ से महान और अणु से विभु बनकर ईश्वरीय सर्व शक्तियों से संपन्न हो जाता है

2 Comments on “Yog tantra

  1. नीरज गुलेरिया

    भक्तियोग से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैँ।

  2. नीरज गुलेरिया

    भक्तियोग से योग सिद्धियाँ प्राप्त होती हैँ.

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